Mahavir Swami Life Sikhna 2022 | With Full Best information in Hindi

mahavir swami life sikhna
mahavir swami life sikhna

न परम्पराओ के अनुसार महावीर से पहले इस धर्म के 23 गुरु हो चुके थे , जो तीर्थकर कहलाते थे | महावीर चौबीसवें तीर्थकर ऋषभदेव थे |

प्रारंभिक तीर्थकरों के सम्बंध में जानकारी वैदिक साहित्य में मिलता है | सबसे पहले तीर्थकर ऋषभदेव थे |

केवल अंतिम दो अर्थात् 23वें और 24 वें तीर्थकर का ही वर्णन इतिहास में मिलता है |

महावीर स्वामी जीवन (mahavir swami life sikhna) 2022

23 वे तीर्थकर श्री पाशर्वनाथ जी ने अपने अनियायियो को जैन – धर्म के चार प्रमुख सिधांत बतलाये थे | 

  1. अहिंसा 
  2. सत्य सम्भाषण 
  3. अस्तेय 
  4. अपरिग्रह 

महावीर स्वामी के जन्म से ठीक 250 वर्ष पूर्व इन्होने निर्वाह प्राप्त किये |  

महावीर का जिवनवृत   

  जैनियों के सबसे अंतिम चौबिसवें तीर्थकर महावीर स्वामी  थे |

जैन धर्म को व्यापक तथा लोकप्रिय बनाने का श्रेय मुख्यत इन्ही को है |

उनका जन्म आधुनिक बिहार राज्य के मुजफ्फरपुर जिला में स्थित वैशाली के समीप कुन्डग्राम में ईसा से 599 वर्ष पूर्व हुआ था |

इनके पिता का नाम शीधार्थ था जो वृज्जियों के ज्ञात्रिक कुल के थे | इनकी माता का नाम त्रिशला था जो वैशाली के

राजा चेटक की बहन थी |

शिधार्थ और  त्रिशला से तिन संताने हुयी थी, एक कन्या और दी पुत्र |

बड़े पुत्र का नाम नन्दिवर्धन था और छोटे पुत्र का नाम वर्धमान |

यही आगे चलकर महावीर के नाम से प्रशिध हुए |

वर्धमान को बड़े होने पर यशोदा नामक युवती से विवाह हुआ | जिससे एक लड़की पैदा हुयी |

माता – पिता के देहांत के बाद 30 वर्ष के उम्र में अपने बड़े भाई नन्दिवर्धन से आज्ञा लेकर वर्धमान ने घर छोर जंगल

की राह ली |

उन्होंने वन में जाकर ज्ञान प्राप्ति के लिए बारह वर्ष तक कठोर तपस्या की | लोगो ने उन्हें लाठियों से मारा ,

इनपर ईट – पत्थर  तथा गन्दी वस्तुयें फेंकी , उनकी खिल्ली उड़ाई गयी और अन्य तरीकों से उनकी तपस्या भंग करने

का प्रयत्न किया गया |

लेकिन वे अपने मार्ग से विचलित नहीं हुए | इस कठोर तपस्या के प्रभाव से उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुयी और उनका हृदय

ज्ञानलोक से जगमगा उठा |

अब उन्होंने सांसारिक बन्धनों को तोड़कर माया – मोह से छुटकारा पा लिया |

अतः वे निर्गंथ कहलाये , जिनका अर्थ होता है बंधन्हीन | उन्होंने अपने इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लिया था |

आतएव वे ‘जिन’ कहलाये | उन्हें बारह वर्ष के तप्स्या के पश्चात जुम्भिक ग्राम के वाह ऋजुपलिका नदी के तट पर

केवल्य ज्ञान की प्राप्ती हुयी थी |

तभी से वे ‘अर्हत’ (पूजनीय) कहलाने लगे | अपार धीरज के साथ उन्होंने सभी मुशिबतो का सामना किया अतएव वे

‘महावीर’ कहलाये | जितेन्द्रिय बन जाने से वे ‘जैन’ कहलाने लगे | 

        ज्ञान प्राप्त करने के बाद तिस वर्ष तक उन्होंने घूम – घूमकर मगध , कौशल , अंग मिथिला , कशी आदि प्रदेशो में

अपनी शिक्षा का प्रचार किया | 

महावीर के उपदेश 

महावीर ने पाँच मुख्य उपदेश दिए | ये पांच महाव्रत है – 

  1. अहिंसा 
  2. अस्तेय (चोरी न करना )
  3. अपरिग्रह 
  4. ब्रहमचर्य 
  5. सत्य 

(1 )अहिंसा  

 महावीर घोर अहिंसावादी थे | उनका कहना था की संसार के कण – कण में जिव है |

उनकी हिंसा नहीं करनी चाहिए | उनके शिष्य रात्रि आरम्भ होने के पहले ही भोजन कर लेते है ताकि अन्धकार में कोए

कीड़े – मकोड़े न मर जाये | (mahavir swami life sikhna)

(२) सत्य 

   सत्य का मतलब है झूठ नहीं बोलना चाहिए | अप्रिय या कठोर बात नहीं बोलनी चाहिए  | किसी की निंदा नहीं करनी

चाहिए | 

(3) अस्तेय 

 किसी की चीज़ चुरानी नहीं चाहिए | चोरी का माल खरीदना , किसी तरह की मिलावट करना , कम तुलना , सरकारी

आदेश का पालन न करना इत्यादि भी चोरी के ही प्रकार है इनसे बचना चाहिए |

(4) अपरीग्रहण

 धन का संग्रह नहीं करना चाहिए | विनोबा भावे का कहना था – ‘पेट भर खाओ , लेकिन पेटी भर कर न रखो’ धन से मोह बढ़ता है |

मोह से बंधन और पक्का हो जाता है |

इस प्रकार धन मुक्ति के मार्ग में बाधक है | (mahavir swami life sikhna)

(5) ब्रह्मचार्य

काम – वासना को मरना चाहिए | कामुकता मुक्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधक है |

त्रिरत्न –

महावीर के अनुसार मनुष्य अज्ञानतावश ही काम, क्रोध, लोभ, मोह, मोह, और मद के वशीभूत होता है |

मोक्ष प्राप्ति के लिए इन तिन साधना का प्रतिपादन किया जो त्रिरत्न के नाम से विख्यात है | ये है –

  1. सम्यक ज्ञान 
  2. ,, दर्शन 
  3. ,, चरित्र 

सम्यक ज्ञान का अर्थ – सच्चा और पूर्ण ज्ञान | बिना सम्यक ज्ञान के मुक्ति की प्राप्ति नहीं होती, उसका ज्ञान समस्त

तीर्थकर के उपदेशों के अध्यन से होता है |

                    सम्यक दर्शन भी इसके लिए आवश्यक है | सभी मनुष्यों के लिए यह अच्छा ह  की वे संसार के सभी जीवधारियों को एक सामान समझे |

                                                                                                          यही इनका सम्यक दर्शन था | सम्यक दर्शन से ही सम्यक ज्ञान की प्राप्ति होती है |

और मनुष्य को अज्ञानता, क्रोध, लोभ, मोह, आदि……. से छुटकारा प्राप्त हो जाता है |

सम्यक चरित्र का अर्थ – उच्च नैतिक स्तर | इसके लिए मनुष्य को अपनी इन्द्रियों , भाषण, और कर्मों, पर पूर्ण नियंत्रण रखना चाहिए |

इसकी प्राप्ति इन्द्रियों , विचार और भाषणों पर नियंत्रण रखने से होती है | इस त्रिरत्न की प्राप्ति हो जाने पर मनुष्य और उनकी आत्मा दोनों को कर्म के बंधन से मुक्ति मिल जाती है |

  • जैन धर्म के सिद्धार्थ – 

सम्पूर्ण जैन-साहित्य के अध्ययन के बाद जैन-धर्म के निम्नलिखित सिद्धांत स्पष्ट होते है | (mahavir swami life sikhna)

इश्वर सम्बन्धी बिचार –

विद्वानों में मतभेद है, लेकिन अब यह निश्चित हो चूका है | की जैन धर्मावलम्बी इश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते |

उनका कहना है की सृष्टि अथवा विश्व का संचालन करने के लिए इश्वर जैसी किसी अलौकिक सत्ता की आवश्यकता नहीं है |

इस धर्म तीर्थकर को ही इश्वर कहा जाता है | तथा मंदिरों में देवी-देवताओं के बजाय तीर्थकरों की ही पूजा की जाती है | जैन-धर्म में इश्वर को निराकार माना गया है |

वे इश्वर को सर्वज्ञ और वीतराग मानते है |

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आत्मवाद

महावीर का कहना था की विश्व में दो बुनियादी पदार्थ है, जिव और अजीव दोनों ही अनादी है | उन्हें किसी ने बनाया नहीं है और दोनों ही स्वतन्त्र है |

जिव का अर्थ आत्मा ही है | जीवन केवल मनुष्य , पशु और वनस्पति में ही नहीं प्राकृतिक वस्तुओ में भी जिव है | संसार में अनगिनत जिव है ,

और सब एक सामान है | विश्व जिव और सजीव के घाट-प्रतिघात से चलता है और कार्य करता है |